राम शरण बिन पार कैसे हुए है भाव सागर।।
निराकार ब्रह्म भगति करीजे।।
चित समावन पूर्ण ब्रह्म में मन चित में रहीजे।।
पूर्ण आस निज प्रभ में रखी।।
ज्ञान बिना जीवन अकार्थ मरीजे।।
केसे जीतो जाए इस मन को।।
पूर्ण गुरदेव एह ज्ञान बतीजे।।